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Monday, July 2, 2018
Thursday, June 21, 2018
वसुंधरा राजे के सामने लगे हनुमान बेनीवाल जिन्दाबाद के नारे, पुलिस ने बरसाए लठ, देखें VIDEO
वसुंधरा राजे के सामने लगे हनुमान बेनीवाल जिन्दाबाद के नारे, पुलिस ने बरसाए लठ, देखें VIDEO
अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान सारण नगर आरओबी का लोकार्पण करने पहुंचे मुख्यमंत्री के सामने हनुमान बेनीवाल समर्थकों ने जमकर नारेबाजी की। इस दौरान बेनीवाल के समर्थन में नारेबाजी कर कर रहे समर्थकों पर हल्का बल प्रयोग करते हुए वहां से खदेड़ा।
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अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान सारण नगर आरओबी का लोकार्पण करने पहुंचे मुख्यमंत्री के सामने हनुमान बेनीवाल समर्थकों ने जमकर नारेबाजी की। इस दौरान बेनीवाल के समर्थन में नारेबाजी कर कर रहे समर्थकों पर हल्का बल प्रयोग करते हुए वहां से खदेड़ा।
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Tuesday, June 19, 2018
राजस्थान में तीसरी ताकत बनकर उभर रहे हैं हनुमान बेनीवाल
राजस्थान में नवंबर में विधानसभा के चुनाव होने हैं और इस बार फिर से एक तीसरी ताकत चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी का अहसास कराने लगी है. हार्दिक पेटल की तरह निकले थे और डी. कुमारस्वामी बनने के ख्वाब देख रहे हैं हनुमान बेनीवाल.
राजस्थान में शुरू से ही दो पार्टियों के बीच राजनीति होती रही है, लेकिन तीसरा मोर्चा गाहे-बगाहे अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है. कभी-कभी यह तीसरा मोर्चा बीजेपी और कांग्रेस दोनों का ही खेल बिगाड़ता रहा है. पूर्व राष्ट्रपति भैरव सिंह शेखावत ने जनता दल की मदद से सरकार चलाई है तो अशोक गहलोत ने बीएसपी के सहारे पांच साल तक सरकार चलाई है. राजस्थान में नवंबर में विधानसभा के चुनाव होने हैं और इस बार फिर से एक तीसरी ताकत चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी का अहसास कराने लगी है.
राजस्थान में पिछले एक साल में किसी भी पार्टी के किसी बड़े नेता ने सबसे बड़ी रैली की है तो वो हैं निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल. हनुमान बेनीवाल खिंवसर से निर्दलीय विधायक हैं. जोधपुर के इलाके में खास करके नागौर बेल्ट में हनुमान बेनीवाल की छवि फायरब्रांड नेता की रही है. हनुमान बेनीवाल जाट युवाओं में खासा लोकप्रिय हैं. राजस्थान की राजनीति में हमेशा से ही जाटों का खासा दबदबा रहा है. राज्य में बहुत लंबे समय तक एक न एक जाट नेता का दबदबा रहा है. कुंभाराम आर्य, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, परसराम मदरेणा, शीशराम ओला, सुमित्रा और कमला बेनीवाल जैसे नेता राजस्थान की राजनीति में कद्दावर जाट नेता रहे हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों से राजस्थान की राजनीति में कोई बड़ा जाट नेता नहीं आया है.
हनुमान बेनीवाल की रैलियों में जिस तरह से युवाओं की भीड़ उमर रही है उसे देख कर ऐसा लगता है बेनिवाल उस जगह को भर रहे हैं. भीड़ वोट में बदली तो इस बार कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए हनुमान बेनीवाल मुश्किल पैदा करने वाले हैं. बीकानेर की रैली हो, बाड़मेर की रैली हो या फिर सीकर की रैली, हनुमान बेनीवाल को सुनने के लिए युवाओं की भारी भीड़ इकट्ठा हो रही है. माना जा रहा है कि राजस्थान के युवाओं की भीड़ जाट नौजवानों की है जो राज्य की राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए छटपटा रहे हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों में यह बेचैनी है कि हनुमान बेनीवाल की सभाओं में कौन लोग आ रहे हैं और कहां से आ रहे हैं. आखिर क्या वजह है कि हनुमान बेनीवाल को सुनने के लिए इतनी बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा हो रहे हैं.
बेनीवाल अब तक नागौर जिले के नेता माने जाते रहे हैं लेकिन जिस तरह से नागौर से बाहर निकलकर बाड़मेर और सीकर और बीकानेर में अपना दबदबा दिखाया है उसे देखकर लगता है कि एक बार फिर राजस्थान में तीसरी ताकत दोनों बड़ी पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस के लिए मुश्किल पैदा करने वाली है. गुजरात के हार्दिक पटेल की तरह बेनीवाल किसी आरक्षण की मांग नही कर रहे हैं. इसके बावजूद बढ़ती लोकप्रियता सवाल उठाती है कि हनुमान बेनीवाल कौन है और ये नेता कैसे बने.
एक दौर था जब तीसरे मोर्चे और कांग्रेस में बड़े और कद्दावर जाट नेता हुआ करते थे. तब भैरोंसिंह शेखावत की वजह से बीजेपी राजपूतों की पार्टी मानी जाती थी. लेकिन बीजेपी ने अपनी रणनीति बदली और सीकर की रैली में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजस्थान के जाटों को आरक्षण देने का ऐलान कर दिया. आरक्षण के लिए जाटों में अगुवाई करने वाले थे राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील, संरक्षक ज्ञानप्रकाश पिलानिया और दूसरे कई छोटे जाट नेता. जाटों को आरक्षण मिलते ही अचानक से जाट राजनीति में इन नेताओं का दबदबा बढ़ा. जाटों को आरक्षण दिलाने के नाम पर ज्ञानप्रकाश पिलानिया बीजेपी से राज्यसभा में पहुंच गए और उनके बेटे को बीजेपी से विधायक का टिकट मिल गया, हालांकि उनका उनके बेटा नवीन पिलानिया बीजेपी के टिकट पर चुनाव हार गए और बाद में एक छोटी पार्टी राजपा से विधायक बने.
दूसरी तरफ राजाराम मील ने कांग्रेस का दामन थामा और अपने भाई गंगाजल मील को कांग्रेस से विधायक बनवा दिया. कांग्रेस की राजनीति में अशोक गहलोत के दबदबे के बाद परसराम मदेरणा हाशिए पर आ गए थे और शीशराम ओला झुंझुनू के नेता बन कर रह गए थे. इन दोनों नेताओं ने अपने बेटे महिपाल मदेरणा और बृजेंद्र ओला को आगे बढ़ाने के लिए हालात से समझौता कर हाशिए पर चले गए. इस बीच राजस्थान यूनिवर्सिटी के लॉ कालेज में हनुमान बेनीवाल छात्र संघ के अध्यक्ष के रुप में एक फायर ब्रांड नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे. जाट वोट बैंक अपनाने के लिए छटपटा रही बीजेपी ने हनुमान बेनीवाल को टिकट थमा दिया और बेनीवाल विधायक बन गए. लेकिन बेनीवाल की बीजेपी में पटरी नहीं बैठी और वह निर्दलीय विधायक के रुप में खींवसर विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा पहुंचे. वसुंधरा राजे के लगातार विरोध ने उन्हें राजस्थान में एक नेता के रूप में स्थापित कर दिया. विपक्ष की खाली जगह को बेनीवल ने बखूबी भरा. इस बीच कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर पड़ा और कांग्रेस पार्टी में जाट अपने आप को हाशिए पर पानी लगे.
महिपाल मदेरणा के जेल जाने के बाद से और कई जाट नेताओं के किनारे कर दिए जाने के अफवाहों के बीच जाट अपने आप को असहज पाने लगे. वसुंधरा राजे के पहली पारी में जाट सत्ता के करीब पहुंचे थे लेकिन बीजेपी में राजपूतों के दबदबे के आगे कभी भी वह खुद को पार्टी में सहज नहीं महसूस कर पाए. इस बीच बेनीवाल ने कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल के खुद को स्थापित किया. बेनीवाल को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका बढ़ती बेरोजगारी ने निभाई. राजस्थान में नौकरी नहीं मिलने से परेशान बेरोजगारों ने हनुमान बेनीवाल का हाथ थामा. बेनीवाल ने परेशान किसानों के दुखती नब्ज पर हाथ रखा. इस बीच राजपूतों के सम्मान के रूप में कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह का नाम सामने आया तो आनंदपाल के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में हनुमान बेनीवाल का भी नाम आया. इस वजह से जाट युवाओं में हनुमान बेनीवाल लोकप्रिय हुए.
वसुंधरा राजे के सबसे करीबी माने जाने वाले मंत्री यूनुस खान को विधानसभा के अंदर और बाहर हनुमान बेनीवाल लगातार ललकारते रहे और इन सब ने हनुमान बेनीवाल की ऐसी इमेज बना दी जिसमें किसान और युवा बेरोजगार जुड़ते चले गए. हालात यह है कि बेनीवाल की रैलियों में भीड़ खुद अपने पैसे से आती है और इतनी बड़ी भीड़ अकेले कोई राजनेता राजस्थान में शायद इकट्ठा कर पाता हो. बीजेपी के कार्यवाहक प्रदेशअध्यक्ष अशोक परनामी कहते हैं कि हनुमान के साथ नागौर के लड़कों की भीड़ है जो सभी जगह की रैलियों में पहुंच जाती है. और बेनीवल जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं उससे युवा आकर्षित होते हैं मगर उनको कोई वोट नहीं देगा. बेनिवाल कहते हैं कि इसबार सत्ता की चाबी वो अपने पास रखेंगे. किसानों से पूर्ण कर्जमाफी और बेरोजगारों को सरकारी नौकरी की गारंटी दे रहे हैं. कर्नाटक चुनाव में जनता दल सेक्यूलर के एच डी.कुमारस्वामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ये खासे उत्साहित है. ऐसा हुआ तो नुकसान दोनों हीं पार्टियों को है. इसबार बीजेपी के परंपरागत वोटर राजपूत नाराज हैं और जाट भी छिटक गए तो भरपाई नहीं होगी. दूसरी तरफ जाट कांग्रेस के परंपरागत वोटर रहे हैं और साथ में वसुंधरा विरोधी वोटों का भी विभाजन पार्टी के लिए नुकसान पहुंचाएगी.
हालांकि बेनीवाल के साथ तीसरा मोर्चा बनाने की बात कहने वाले मीणा नेता किरोड़ी लाल मीणा बीजेपी में जा चुके हैं. इसी वजह से बेनीवाल को बार-बार ऐलान करना पड़ रहा है कि वह बीजेपी और कांग्रेस में नहीं जाएंगे. बल्कि दोनों के खिलाफ तीसरा मोर्चा बनाकर लड़ेंगे. जाट समाज के लोग बड़ी मात्रा में इन्हें पैसों का भी सहयोग कर रहे हैं. राजस्थान में जाट करीब 12 फीसदी है और दो सौ में से 75 सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं. बेनीवाल जानते हैं कि अकेले जाटों के दम पर सत्ता में नहीं आ सकते हैं, लिहाजा बहुजन समाज पार्टी और घनश्याम तिवाड़ी के दीन दायाल वाहिनी के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने में लगे हैं. कहा जा रहा है कि गुजरात में जिस तरह से हार्दिक पटेल की अगुवाई में पटेलों ने बीजेपी के खिलाफ बड़ी संख्या में वोट किया, कुछ उसी तरह से हनुमान बेनीवाल जाटों को अपनी तरफ मोड़ सकते हैं.!
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राजस्थान में शुरू से ही दो पार्टियों के बीच राजनीति होती रही है, लेकिन तीसरा मोर्चा गाहे-बगाहे अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है. कभी-कभी यह तीसरा मोर्चा बीजेपी और कांग्रेस दोनों का ही खेल बिगाड़ता रहा है. पूर्व राष्ट्रपति भैरव सिंह शेखावत ने जनता दल की मदद से सरकार चलाई है तो अशोक गहलोत ने बीएसपी के सहारे पांच साल तक सरकार चलाई है. राजस्थान में नवंबर में विधानसभा के चुनाव होने हैं और इस बार फिर से एक तीसरी ताकत चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी का अहसास कराने लगी है.
राजस्थान में पिछले एक साल में किसी भी पार्टी के किसी बड़े नेता ने सबसे बड़ी रैली की है तो वो हैं निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल. हनुमान बेनीवाल खिंवसर से निर्दलीय विधायक हैं. जोधपुर के इलाके में खास करके नागौर बेल्ट में हनुमान बेनीवाल की छवि फायरब्रांड नेता की रही है. हनुमान बेनीवाल जाट युवाओं में खासा लोकप्रिय हैं. राजस्थान की राजनीति में हमेशा से ही जाटों का खासा दबदबा रहा है. राज्य में बहुत लंबे समय तक एक न एक जाट नेता का दबदबा रहा है. कुंभाराम आर्य, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, परसराम मदरेणा, शीशराम ओला, सुमित्रा और कमला बेनीवाल जैसे नेता राजस्थान की राजनीति में कद्दावर जाट नेता रहे हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों से राजस्थान की राजनीति में कोई बड़ा जाट नेता नहीं आया है.
हनुमान बेनीवाल की रैलियों में जिस तरह से युवाओं की भीड़ उमर रही है उसे देख कर ऐसा लगता है बेनिवाल उस जगह को भर रहे हैं. भीड़ वोट में बदली तो इस बार कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए हनुमान बेनीवाल मुश्किल पैदा करने वाले हैं. बीकानेर की रैली हो, बाड़मेर की रैली हो या फिर सीकर की रैली, हनुमान बेनीवाल को सुनने के लिए युवाओं की भारी भीड़ इकट्ठा हो रही है. माना जा रहा है कि राजस्थान के युवाओं की भीड़ जाट नौजवानों की है जो राज्य की राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए छटपटा रहे हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों में यह बेचैनी है कि हनुमान बेनीवाल की सभाओं में कौन लोग आ रहे हैं और कहां से आ रहे हैं. आखिर क्या वजह है कि हनुमान बेनीवाल को सुनने के लिए इतनी बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा हो रहे हैं.
बेनीवाल अब तक नागौर जिले के नेता माने जाते रहे हैं लेकिन जिस तरह से नागौर से बाहर निकलकर बाड़मेर और सीकर और बीकानेर में अपना दबदबा दिखाया है उसे देखकर लगता है कि एक बार फिर राजस्थान में तीसरी ताकत दोनों बड़ी पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस के लिए मुश्किल पैदा करने वाली है. गुजरात के हार्दिक पटेल की तरह बेनीवाल किसी आरक्षण की मांग नही कर रहे हैं. इसके बावजूद बढ़ती लोकप्रियता सवाल उठाती है कि हनुमान बेनीवाल कौन है और ये नेता कैसे बने.
एक दौर था जब तीसरे मोर्चे और कांग्रेस में बड़े और कद्दावर जाट नेता हुआ करते थे. तब भैरोंसिंह शेखावत की वजह से बीजेपी राजपूतों की पार्टी मानी जाती थी. लेकिन बीजेपी ने अपनी रणनीति बदली और सीकर की रैली में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजस्थान के जाटों को आरक्षण देने का ऐलान कर दिया. आरक्षण के लिए जाटों में अगुवाई करने वाले थे राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील, संरक्षक ज्ञानप्रकाश पिलानिया और दूसरे कई छोटे जाट नेता. जाटों को आरक्षण मिलते ही अचानक से जाट राजनीति में इन नेताओं का दबदबा बढ़ा. जाटों को आरक्षण दिलाने के नाम पर ज्ञानप्रकाश पिलानिया बीजेपी से राज्यसभा में पहुंच गए और उनके बेटे को बीजेपी से विधायक का टिकट मिल गया, हालांकि उनका उनके बेटा नवीन पिलानिया बीजेपी के टिकट पर चुनाव हार गए और बाद में एक छोटी पार्टी राजपा से विधायक बने.
दूसरी तरफ राजाराम मील ने कांग्रेस का दामन थामा और अपने भाई गंगाजल मील को कांग्रेस से विधायक बनवा दिया. कांग्रेस की राजनीति में अशोक गहलोत के दबदबे के बाद परसराम मदेरणा हाशिए पर आ गए थे और शीशराम ओला झुंझुनू के नेता बन कर रह गए थे. इन दोनों नेताओं ने अपने बेटे महिपाल मदेरणा और बृजेंद्र ओला को आगे बढ़ाने के लिए हालात से समझौता कर हाशिए पर चले गए. इस बीच राजस्थान यूनिवर्सिटी के लॉ कालेज में हनुमान बेनीवाल छात्र संघ के अध्यक्ष के रुप में एक फायर ब्रांड नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे. जाट वोट बैंक अपनाने के लिए छटपटा रही बीजेपी ने हनुमान बेनीवाल को टिकट थमा दिया और बेनीवाल विधायक बन गए. लेकिन बेनीवाल की बीजेपी में पटरी नहीं बैठी और वह निर्दलीय विधायक के रुप में खींवसर विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा पहुंचे. वसुंधरा राजे के लगातार विरोध ने उन्हें राजस्थान में एक नेता के रूप में स्थापित कर दिया. विपक्ष की खाली जगह को बेनीवल ने बखूबी भरा. इस बीच कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर पड़ा और कांग्रेस पार्टी में जाट अपने आप को हाशिए पर पानी लगे.
महिपाल मदेरणा के जेल जाने के बाद से और कई जाट नेताओं के किनारे कर दिए जाने के अफवाहों के बीच जाट अपने आप को असहज पाने लगे. वसुंधरा राजे के पहली पारी में जाट सत्ता के करीब पहुंचे थे लेकिन बीजेपी में राजपूतों के दबदबे के आगे कभी भी वह खुद को पार्टी में सहज नहीं महसूस कर पाए. इस बीच बेनीवाल ने कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल के खुद को स्थापित किया. बेनीवाल को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका बढ़ती बेरोजगारी ने निभाई. राजस्थान में नौकरी नहीं मिलने से परेशान बेरोजगारों ने हनुमान बेनीवाल का हाथ थामा. बेनीवाल ने परेशान किसानों के दुखती नब्ज पर हाथ रखा. इस बीच राजपूतों के सम्मान के रूप में कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह का नाम सामने आया तो आनंदपाल के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में हनुमान बेनीवाल का भी नाम आया. इस वजह से जाट युवाओं में हनुमान बेनीवाल लोकप्रिय हुए.
वसुंधरा राजे के सबसे करीबी माने जाने वाले मंत्री यूनुस खान को विधानसभा के अंदर और बाहर हनुमान बेनीवाल लगातार ललकारते रहे और इन सब ने हनुमान बेनीवाल की ऐसी इमेज बना दी जिसमें किसान और युवा बेरोजगार जुड़ते चले गए. हालात यह है कि बेनीवाल की रैलियों में भीड़ खुद अपने पैसे से आती है और इतनी बड़ी भीड़ अकेले कोई राजनेता राजस्थान में शायद इकट्ठा कर पाता हो. बीजेपी के कार्यवाहक प्रदेशअध्यक्ष अशोक परनामी कहते हैं कि हनुमान के साथ नागौर के लड़कों की भीड़ है जो सभी जगह की रैलियों में पहुंच जाती है. और बेनीवल जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं उससे युवा आकर्षित होते हैं मगर उनको कोई वोट नहीं देगा. बेनिवाल कहते हैं कि इसबार सत्ता की चाबी वो अपने पास रखेंगे. किसानों से पूर्ण कर्जमाफी और बेरोजगारों को सरकारी नौकरी की गारंटी दे रहे हैं. कर्नाटक चुनाव में जनता दल सेक्यूलर के एच डी.कुमारस्वामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ये खासे उत्साहित है. ऐसा हुआ तो नुकसान दोनों हीं पार्टियों को है. इसबार बीजेपी के परंपरागत वोटर राजपूत नाराज हैं और जाट भी छिटक गए तो भरपाई नहीं होगी. दूसरी तरफ जाट कांग्रेस के परंपरागत वोटर रहे हैं और साथ में वसुंधरा विरोधी वोटों का भी विभाजन पार्टी के लिए नुकसान पहुंचाएगी.
हालांकि बेनीवाल के साथ तीसरा मोर्चा बनाने की बात कहने वाले मीणा नेता किरोड़ी लाल मीणा बीजेपी में जा चुके हैं. इसी वजह से बेनीवाल को बार-बार ऐलान करना पड़ रहा है कि वह बीजेपी और कांग्रेस में नहीं जाएंगे. बल्कि दोनों के खिलाफ तीसरा मोर्चा बनाकर लड़ेंगे. जाट समाज के लोग बड़ी मात्रा में इन्हें पैसों का भी सहयोग कर रहे हैं. राजस्थान में जाट करीब 12 फीसदी है और दो सौ में से 75 सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं. बेनीवाल जानते हैं कि अकेले जाटों के दम पर सत्ता में नहीं आ सकते हैं, लिहाजा बहुजन समाज पार्टी और घनश्याम तिवाड़ी के दीन दायाल वाहिनी के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने में लगे हैं. कहा जा रहा है कि गुजरात में जिस तरह से हार्दिक पटेल की अगुवाई में पटेलों ने बीजेपी के खिलाफ बड़ी संख्या में वोट किया, कुछ उसी तरह से हनुमान बेनीवाल जाटों को अपनी तरफ मोड़ सकते हैं.!
Monday, June 18, 2018
सीकर किसान हुँकार रैली पर हनुमान बेनिवाल ऐप की खास रिपोर्ट !!
मित्रों इस ऐप को अधिक से अधिक शेयर करें ताकि राष्ट्रीय मिडिया को भी पता चले कि श्री हनुमान बेनीवाल की TRP कितनी है।
ग्राउंड रिपोर्ट: यह निर्दलीय विधायक राजस्थान में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन सकता है!
आज से कोई 15 साल पहले की बात है. जोधपुर में जाट समाज की एक सभा हो रही थी. अटल बिहारी वाजपेयी उस समय प्रधानमंत्री हुआ करते थे. 1999 में उन्होंने राजस्थान के जाटों को केंद्र की OBC लिस्ट में जगह दी. 2003 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में वो अपने इसी काम को सियासी तौर पर भुनाना चाहते थे. उस समय राजस्थान बीजेपी के पास कोई बड़ा जाट चेहरा नहीं हुआ करता था. इस निर्वात को भरने के लिए दिल्ली के जाट नेता और वाजपेयी सरकार के मंत्री साहब सिंह वर्मा को राजस्थान के जाट बाहुल्य वाले इलाकों में प्रचार के लिए भेजा गया. जोधपुर की इस सभा को भी वही संबोधित करने जा रहे थे.
दोपहर के 12 बजने को थे. साहब सिंह वर्मा अभी मंच पर पहुंचे नहीं थे. उनके आने से पहले भीड़ को बांधे रखने के लिए मंच स्थानीय नेताओं के हवाले किया गया था. लोग जानते थे कि यह हर राजनीतिक जलसे में मुख्यवक्ता के बोलने से पहले की जरुरी प्रक्रिया है. वो पूरी ऊब के साथ इन वक्ताओं को सुने जा रहे थे. इस बीच मंच पर एक नौजवान को बुलाया गया. बेतरतीब तरीके से बढ़ी हुई दाढ़ी वाले इस नौजवान ने अपने भाषण की पहली कुछ लाइनों में ही जनता को बांध लिया. उसकी आवाज बुलंद थी. उसके पास शब्दों का टोटा नहीं था. वो बोलने के हुनर में तब से माहिर हो चुका था, जब वो राजस्थान विश्वविद्यालय का अध्यक्ष हुआ करता था. उसने बोलना शुरू किया-
“जाट बिरादरी, जो राजस्थान में सबसे ज्यादा बलवान, निडर और संख्या के लिहाज से सबसे मजबूत बिरादरी है. राजनीतिक दृष्टि से भी यह बिरादरी राजस्थान में सबसे आगे है. जाटों को मिला आरक्षण लोगों को सुहाया (पसंद नहीं आया) नहीं. सोशल जस्टिस फ्रंट के नाम से भाई कल्याण सिंह कालवी के लड़के लोकेंद्र सिंह कालवी ने 17 दिसंबर को सीकर के अन्दर एक रैली की. इस रैली में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का षड्यंत्र शामिल है.
पिछले लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में पहली बार गांव से आने वाली जाट महिलाएं सबसे ज्यादा संख्या में चुनकर आईं. अशोक गहलोत कभी नहीं चाहेंगे कि राजस्थान में जाट प्रशासनिक तौर पर मजबूत हों. अगर राजस्थान में जाट प्रशासनिक तौर पर मजबूत हो गया तो यह इनको कुछ भी निकालकर देने वाला नहीं है.”
इस नेता का नाम था हनुमान बेनीवाल. वो अपने भाषण में लोकेंद्र कालवी की जिस सीकर रैली का जिक्र कर रहे थे वो अपने एक बयान के चलते विवाद में फंस गई थी. इस विवाद को समझने के लिए सीकर 1998 में हुई रैली का जिक्र जरुरी है. 1998 में एक नाटकीय घटनाक्रम में इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री पद से रुखसत होना पड़ा. लोकसभा के लिए मध्यावधि चुनाव हुए. अटल बिहारी वाजपेयी उस दौर में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हुआ करते थे. बीजेपी ‘लक्ष्य अटल, वोट कमल’ के नारे पर चुनाव लड़ रही थी.
चुनाव प्रचार के लिए अटल बिहारी वाजपेयी राजस्थान के सीकर भी आए. राजस्थान में जाट आरक्षण आंदोलन अपने चरम पर था. सीकर में जाट बिरादरी के वोट बड़ी तादाद में थे. इस समय तक बीजेपी की छवि शहरी पार्टी के तौर पर ही थी. खेतिहर जाटों को अपने खेमे में लाने के लिए उन्होंने अपनी सीकर रैली में सरकार बनने के बाद जाटों को ओबीसी में आरक्षण देने की घोषणा कर दी.
देवी सिंह भाटी उस दौर में राजपूतों के कद्दावर नेता हुआ करते थे. वो बीकानेर के कोलायत से लगातार पांच विधानसभा चुनाव जीत चुके थे. इधर करणी सेना वाले लोकेंद्र सिंह कालवी भी राजपूत समाज में अपनी पकड़ बनाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे. दोनों उस समय बीजेपी के नेता हुआ करते थे. दोनों ने मिलकर अगड़ी जातियों के लिए आरक्षण आंदोलन चलाना शुरू किया. इन्होंने इसके लिए एक संगठन भी खड़ा किया, ‘सामाजिक न्याय मंच’. यह जाट आरक्षण आंदोलन का काउंटर नैरेटिव था.
लोकेंद्र कालवी और देवी सिंह भाटी सामाजिक न्याय मंच के बैनर तले जगह-जगह पर सभाएं कर रहे थे. अपनी सीकर रैली में लोकेंद्र कालवी ने आरक्षण की आलोचना करते हुए कहा था, ‘यहां घोड़ों को नहीं मिल रही है घास, और गधे खा रहे हैं चवनप्राश’ .आरक्षण के खिलाफ यह जुमला इससे पहले भी कई मंचों पर इस्तेमाल हो चुका था. राजस्थान में किवदंतियों के चलते इस जुमले ने विवाद को पैदा कर दिया. हर इलाके में जाति विशेष को चिढ़ाने के लिए कुछ शब्द गढ़े जाते हैं. पश्चिमी राजस्थान में जाटों को चिढ़ाने के लिए ‘गधा’ कहा जाता है. इस नुक्ते से देखने पर कालवी के बयान के मायने बदल जाते हैं.
सीकर वो जगह थी जहां जाटों ने अपने लिए आरक्षण लिया. सीकर वो जगह थीं जहां लोकेंद्र सिंह कालवी ने जाट विरोधी ध्रुवीकरण की कोशिश में विवादित बयाना दिया था. लोकेंद्र सिंह कालवी की रैली के 15 साल बाद सीकर में एक और रैली हुई. यह घटनाओं के चक्र के पूरे होने जैसा था. 10 जून 2018 को राजस्थान के सीकर में ‘ किसान हुंकार रैली’ का चौथा जुटान था. इससे पहले वो नागौर, बाड़मेर और बीकानेर में इसी नाम रैली कर चुके हैं. बाड़मेर में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से ज्यादा भीड़ जुटाकर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां हासिल की थीं. 2003 में अपने लिए सियासी जमीन की तलाश कर रहे हनुमान बेनीवाल डेढ़ दशक के भीतर एक मंझे हुए राजनेता के तौर पर उभर चुके हैं. उनके प्रभाव का दायरा एक विधानसभा सीट से बढ़कर पांच-छह जिलों तक फ़ैल चुका है.
2008 में एक फिल्म आई थी ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’. इस फिल्म का एक गाना, ‘जय हो’ बहुत हिट हुआ था. गुलजार के लिखे बोल और सुखविंदर सिंह की आवाज में रहमान का संगीत हमेशा मारक होता है. 2009 में कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में अपने प्रचार अभियान में इस गाने के इस्तेमाल के लिए टी-सीरीज को दो लाख डॉलर चुकाए थे. इस गाने के बोल इस तरह हैं –
“चख ले हां चख ले ये रात शहद है
चख ले रख ले
दिल है दिल आखिरी हद है
रख ले काला काला काजल तेरा
कोई काला जादू है ना..
आजा आजा जींद शामियाने के तले
आजा ज़री वाले नीले आसमान के तले
जय हो…”
किसान हुंकार रैली के पोस्टर पर जलसा शुरू होने का वक़्त 11 बजे दर्ज था. हनुमान बेनीवाल को मंच पहुंचते-पहुंचते 2 बज गए. जैसे ही मंच की तरफ बढ़ने लगे पंडाल में चारों तरफ बिखरे लोग मंच के सामने सिमट आए. जिन्हें जगह नहीं वो मिली वो दो पंडालों की सरहद के तौर पर लगाए गए लोहे के पाइपों पर चढ़ गए. बैकग्राउंड में यही गाना बज रहा था. जिसके बोलों से किसी को कोई मतलब नहीं था. लोग गाने के आखिरी हिज्जे को जोर से गा रहे थे. इस तरह जब हनुमान बेनीवाल मंच पर चढ़े, स्पीकर से लेकर भीड़ तक हर जगह ‘जय हो-जय हो’ की प्रतिध्वनि थी.
एक छात्रनेता इतना असरदार क्योंकर हुआ?
आखिर इस आदमी के इतना लोकप्रिय होने की वजह क्या है? क्यों हरियाणा से लेकर बाड़मेर तक लोग बेनीवाल की रैली अटेंड करने पहुंच जा रहे हैं. इसका जवाब हमें मिला रैली में आए हुए पप्पू बेनीवाल से. चुरू में रहने वाले पप्पू एक दफा जोधपुर जा रहे थे. जोधपुर के पास उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया. उन्होंने आधी रात को मदद के लिए हनुमान बेनीवाल के पास फोन किया. उनका कहना है कि हनुमान बेनीवाल आधे घंटे में खुद मौके पर पहुंच गए थे. उनकी खुद की विधानसभा में आपको ऐसी दर्जनों कहानियां मिल जाएंगी. इलाके के हर आदमी के पास उनके नंबर हैं. वो अपना फोन खुद उठाते हैं. अगर नहीं उठा पाते तो पलटकर फोन करते हैं. उन्होंने लोगों में यह भरोसा कायम किया है कि वो किसी भी वक़्त उन तक पहुंच सकते हैं.
राजस्थान का पश्चिमी इलाका जाट राजनीति का गढ़ रहा है. किसी दौर में राजस्थान के तीन बड़े सियासी जाट घराने इसी इलाके से आते थे. नाथूराम मिर्धा, परसराम मदेरणा मारवाड़ में और शीशराम ओला शेखावाटी में जाटों के सबसे बड़े नेता थे. संयोगवश ये तीनों ही परिवार अपनी राजनीतिक जमीन गंवा चुके हैं. हनुमान के उभार के पीछे इस निर्वात ने भी बड़ी भूमिका निभाई है.
*जेएमएम समीकरण*
हनुमान बेनीवाल मंच पर पांच लाख लोगों को जुटाने का दावा कर रहे थे. हालांकि यह दावा ही था. लेकिन सीकर में जहां उनका पहले कोई ख़ास आधार नहीं था, उन्होंने इतनी भीड़ जुटा ली थी कि वो कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं की पेशानी में बल ला पाएं. सीकर, झुंझनू, चुरू के अलावा बाड़मेर, नागौर, जोधपुर और बीकानेर से भी उनके समर्थक उनकी रैली में पहुंचे हुए थे. लगभग आधे घंटे के उनके भाषण में जो बात सबसे ज्यादा मार्के की थी वो कुछ इस तरह से बयान की गई-
*“बाड़मेर की रैली में जिस जेएमएम मोर्चे की घोषणा हमने की थी वो प्रदेश में आगे-आगे चलेगा.”*
जेएमएम मोर्चा आखिर है क्या? इस बात का जवाब देने से पहले चाय के कप पर हुई एक बतकही का जिक्र करना चाहिए. ये 2017 के जाड़े की बात है. हनुमान बेनीवाल नागौर में किसान हुंकार रैली का पहला संस्करण दाग चुके थे. जयपुर के जवाहर कला केंद्र में तीन पत्रकार इसी रैली पर बतकही कर रहे थे. इनमें से एक पत्रकार का कहना था कि अगर यह आदमी कायदे से चले तो राजस्थान का मुलायम सिंह यादव बन सकता है. सिर्फ जाटों के दम पर वो मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगे. सत्ता हासिल करने के लिए बेनीवाल को अल्पसंख्यक और दलित बिरादरी को अपने साथ लाना होगा.
बाड़मेर में घटनाओं ने प्रत्याशित मोड़ लिया. जनवरी 2018 में यहां हुई किसान हुंकार रैली में बेनीवाल जब मंच पर चढ़े तो उनकी जेब में नया जातिगत समीकरण पड़ा हुआ था. यह समीकरण था जेएमएमएम. माने जाट, मेघवाल, मुस्लिम और मीणा. मेघवाल पश्चिमी राजस्थान में दलितों की सबसे बड़ी बिरादरी है. इस मंच पर किरोड़ी लाल मीणा उनके साथ थे. मार्च 2018 में मीणा ने दस साल के लंबे वनवास के बाद बीजेपी का रुख किया. जाते-जाते वो अपने साथ इस समीकरण का आखरी ‘एम’ भी ले गए. सीकर में हनुमान बेनीवाल के पास सिर्फ जाट, मेघवाल और मुस्लिम का समीकरण बचा हुआ था. उनके मंच पर दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के कई नेता थे.
अपने भाषण में वो इस साल के 2 अप्रैल को हुए दलित आंदोलन का जिक्र कर रहे थे. उन्होंने बताया कि उस समय वो जैसलमेर में थे. उन्होंने उस समय प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दलितों का पूरा समर्थन किया था. वो कहते हैं-
*“दिल्ली की सरकार ने 23 दलितों को मौत के घाट उतार दिया. मरने के लिए इस देश में या तो गुर्जर है, या जाट है, या दलित है, या मुसलमान है. ये वो तमाम कौमें हैं जिनका आज तक शोषण हुआ.”*
इससे पहले वो अपने की भाषण की शुरुआत तेजा जी, बजरंगबली और रामसा पीर के जयकारे से करते हैं. तेजा जी राजस्थान के लोक देवता हैं. जाटों के बीच उनकी मान्यता बहुत ज्यादा है. इसी तरह से रामदेव जी महाराज भी राजस्थान के लोक देवता हैं. उन्हें मुस्लिम समुदाय के लोग रामसा पीर के नाम से पूजते हैं. पोकरण के पास रामदेवरा में उनका बड़ा मंदिर है. रामदेव जी मेघवाल समुदाय में भी बेहद लोकप्रिय हैं. यह जयकारा उनके चुनावी समीकरण का स्पष्टीकरण था.
*कितना सफल होगा समीकरण?*
पिछले दौर में दलित उत्पीड़न के दो मामलों में राजस्थान, राष्ट्रीय मीडिया की चर्चाओं में रहा. पहला मौक़ा था डांगावास में दलित समुदाय पर हुआ हमला. नागौर की मेड़ता तहसील के गांव डांगावास में एक मामूली जमीन विवाद ने मई 2015 में जातिगत हिंसा का रूप ले लिया था. इसमें 6 दलितों को जाट बिरादरी के लोगों ने मौत के घाट उतार दिया था. इस घटना के बाद दलित और जाट बिरादरी आमने-सामने हो गई थी. डांगावास आज भी पश्चिमी राजस्थान की मेघवाल बिरादरी की स्मृतियों में खैरलांजी की तरह दर्ज है.
दूसरा मौक़ा 2 अप्रैल के हालिया प्रदर्शन का है. राजस्थान में कई जगह दलित प्रदर्शनकारियों को हमलों का सामना करना पड़ा था. बाड़मेर, जोधपुर में ख़ास तौर दलित और जाट बिरादरी आमने-सामने हो गई थी. हनुमान बेनीवाल अपने भाषण में जैसलमेर की प्रेस कॉन्फ्रेंस का हवाला दे रहे थे. हो सकता है कि दलितों में उनकी लोकप्रियता ठीक-ठाक हो लेकिन उनकी बुनियादी पहचान जाट लीडर के तौर पर ही है. डांगावास जैसी घटनाओं के बाद दलितों का जाटों के प्रति अविश्वास बढ़ा है. ऐसे में दोनों जातियों को एक फोल्ड में लाना आसान नहीं होगा.
30 मई 2015 को नागौर से 20 किलोमीटर दूर बसे गांव कुम्हारी में अचानक सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया था. यह मुस्लिम बाहुल्य वाला गांव है. वाट्सएप्प के जरिए यहां अफवाह फैलाई गई कि 200 गायों को काटा गया है. जबकि यह जगह सरकार के द्वारा मरे हुए पशुओं के निस्तारण के लिए मुकर्र की गई थी. उस समय आस-पड़ोस के 10-15 गांवों के लोगों ने कुम्हारी को घेर लिया था. इन गांवों में जाटों की तादाद काफी ज्यादा है. हनुमान बेनीवाल ने यहां अपनी सूझबूझ से बड़ी सांप्रदायिक घटना को टाला था. इस घटना के बाद मुस्लिम बिरादरी में उनकी छवि काफी बेहतर हुई थी.
हनुमान बेनीवाल के साथ संकट यह है कि उनका सबसे बड़ा समर्थक जाट बिरादरी से आता है. वो इस बिरादरी के खिलाफ जाने का रिस्क नहीं ले सकते. दलितों और मुस्लिम समुदाय के लोगों को अपने साथ लेने के लिए उन्हें इन्हीं समुदायों के साफ छवि वाले नेता चाहिए होंगे. तो फिलहाल उनकी पूरी सियासी कवायद सिर्फ उनके इर्द-गिर्द है. ऐसे में दूसरे समुदाय के जो नेता उनके साथ जुड़े हुए हैं उनकी कोई मजबूत स्वतंत्र पहचान नहीं बन पा रही है. हो सकता है कि वो जयपुर की अपनी रैली में अपनी पूरी टीम जनता के सामने पेश करें. लेकिन यह विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले होगा. इतने कम समय में इनके लिए अपनी टीम के दलित और मुस्लिम चेहरों को जनता के बीच स्थापित करना टेढ़ी खीर होगी. उन्हें यह काम काफी पहले शुरू कर देना चाहिए था.
*इतिहास का सबक*
राजस्थान में 1977 तक एकछत्र कांग्रेस का शासन रहा. कांग्रेस के वर्चस्व को पहली मर्तबा चुनौती दी भैरों सिंह शेखावत ने. उस समय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था. 1977 के चुनाव में कांग्रेस को इंदिरा विरोधी लहर के चलते हार का मुंह देखना पड़ा था. भैरों सिंह शेखावत सूबे के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे. 1980 में इंदिरा ने सत्ता में लौटने के बाद भैरों सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया था. इसके बाद उन्हें 10 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा था. 1990 में वो मंदिर लहर में दूसरी मर्तबा मुख्यमंत्री बने. 1992 में बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने एक बार फिर से भैरों सिंह को गद्दी से उतारकर सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था.
1993 में सूबे में नए सिरे से चुनाव हुए. भैरों सिंह शेखावत इस चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर पत्थर को उलटकर देख रहे थे. ऐसे में काम आए उनके एक पड़ोसी. दरअसल जयपुर के सिविल लाइन्स में भैरों सिंह शेखावत के घर के ठीक सामने पूर्व मुख्यमंत्री बरकतुल्ला खान घर हुआ करता था. बरकत साहब के चले जाने के बाद यह घर उनके एकलौते दामाद ख़्वाजा हलीम की मिल्कियत में आ गया था. हमील उत्तर प्रदेश में समजवादी पार्टी के बड़े नेता थे. कभी-कभी जयपुर आने पर उनकी मुलाकात भैरों सिंह से भी हो जाया करती थी.
1993 में समाजवादी पार्टी को बने जुम्मा-जुम्मा चार रोज़ हुए थे. उत्तर प्रदेश में सीएम की कुर्सी पर बैठे मुलायम सिंह यादव अपनी नई पार्टी का आधार उत्तर प्रदेश से बाहर ले जाने को बेक़रार थे. हलीम ने उनके सामने राजस्थान चुनाव में उम्मीदवार उतारने की योजना रखी. मुलायम सिंह ने बिना किसी सवाल के इस योजना के लिए हामी भर दी. पुराने पत्रकार बताते हैं कि भैरों सिंह के इशारे पर ही समाजवादी पार्टी राजस्थान विधानसभा चुनाव में उतरी थी. भैरों सिंह शेखावत की योजना यह थी कि समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोटों में फाड़ डालने में कामयाब हो जाएगी. इसके लिए उन्होंने अपने भरोसेमंद सिपहसलार रघुबीर शेखावत को हलीम के साथ लगा दिया. हालांकि यह दांव बहुत सफल साबित नहीं हुआ. समाजवादी पार्टी को 18 में 17 सीटों पर जमानत जब्त करवानी पड़ी.
राजस्थान में तीसरा मोर्चा खड़ा करने का सबसे गंभीर प्रयास 2003 में हुआ. देवी सिंह भाटी और लोकेंद्र सिंह कालवी ने राजस्थान सामाजिक न्याय मंच के नाम से अपनी अलग पार्टी खड़ी की. इस पार्टी के पास अपना जातिगत समीकरण था. यह अगड़ी जातियों की गोलबंदी की कोशिश थी. इसमें गैर-जाट पिछड़ी जातियों को यह कहकर शामिल करने की कोशिश की गई थी कि जाटों को पिछड़ा वर्ग में आरक्षण मिलने के बाद शेष 200 से ज्यादा पिछड़ी जातियों का हक़ मारा जाना तय है. ऐसे में इस आरक्षण के खिलाफ एक होना जरूरी है. इस मोर्चे ने 65 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इसमें से 60 जगह जमानत जब्त हो गई थी. चार जगहों पर सामाजिक न्याय मंच के उम्मीदवार जमानत बचाने में कामयाब रहे थे. देवी सिंह भाटी इस मोर्चे के अकेले विधायक बने थे. हालांकि इस मोर्चे को बहुत कामयाबी नहीं मिली थी लेकिन इसने कई सीटों का गणित बिगाड़ दिया था.
2008 के चुनाव में किरोड़ी लाल मीणा ने बीजेपी से बगावत करके करीब 18 सीटों पर अपने निर्दलीय विधायक उतारे थे. उनके कुल 4 उम्मीदवार जीत कर आए थे. इसके आलवा उन्होंने पूर्वी राजस्थान की कई सीटों पर बीजेपी को बड़ा नुकसान पहुंचाया था. इस चुनाव में कांग्रेस को 200 में 96 सीट हासिल हुई थी. बीजेपी की हार के लिए किरोड़ी मीणा के भीतरघात को सबसे बड़ी वजह बताया गया था.
पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दौरान हनुमान बेनीवाल भी नागौर सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे. बीजेपी ने ज्योति मिर्धा के खिलाफ सीआर चौधरी को उतारा था. नागौर कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में से एक रही है. 1977 की इंदिरा विरोधी लहर के दौरान उत्तर भारत में इंदिरा गांधी का पत्ता साफ़ हो गया था. उस समय भी यह सीट कांग्रेस के खाते में गई थी. हनुमान बेनीवाल की मौजूदगी ने इस मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया था. वो डेढ़ लाख वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे. ज्योति मिर्धा 73,997 वोट से यह चुनाव हार गई थीं.
फिलहाल राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर उभर रही है. हनुमान बेनीवाल की मौजूदगी कई सीटों पर इस लहर में सेंधमारी करेगी. उनकी रैली में उमड़ती भीड़ को देखते हुए कहा जा सकता है कि वो कई जगहों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकने का माद्दा रखते हैं. यह कांग्रेस के लिए बुरी खबर है. कांग्रेस को उनकी मौजूदगी का सबसे ज्यदा घाटा उठाना पड़ेगा.
इससे भी बुरी खबर है युवाओं में बढ़ती उनकी लोकप्रियता. जाट परंपरागत तौर पर कांग्रेस के वोटर माने जाते हैं. हालांकि पिछले दस साल में जाटों का एक हिस्सा बीजेपी की तरफ मुड़ा है. लेकिन कांग्रेस का सबसे बड़ा जनाधार इसी बिरादरी में है. हनुमान बेनीवाल जिस तेजी से जाट युवाओं में अपनी पकड़ बना रहे हैं यह कांग्रेस के जनाधार को आने वाले सालों में बड़ा पलीता लगाएगा. सूबे में कांग्रेस के नेता अभी से अपनी जीत को निश्चित मानकर चल रहे हैं. इस अति-विश्वास में वो राजस्थान की जाट पट्टी के अंडरकरंट को सही तरीके से माप नहीं पा रहे हैं. आने वाले समय में उनको इसका घाटा भी उठाना पड़ सकता है.
जब हम रैली से निकल रहे थे तो बारिश के बाद सूरज निकल आया था. उमस अपने साथ पसीने की चिपचिपाहट लेकर आई थी. सड़क किनारे खड़ी बाइक पर दो युवा बैठे हुए थे. उनके बदरंग शर्ट उनके बदन से चिपके हुए थे. आगे वाला शख्स सेल्फी ले रहा था. पीछे वाल उत्तेजना में मुट्ठी बंद करके नारा लगा रहा था, ‘हनुमान बेनीवाल जिंदाबाद’, ‘किसान एकता जिंदाबाद’. ये दोनों युवा 50 किलोमीटर का सफ़र तय करके इस रैली में आए थे. किसानों की कर्जा माफ़ी हनुमान बेनीवाल का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है. अगर वो इस चुनाव को विकास की बजाए किसान की तरफ मोड़ पाते हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत होगी.
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ग्राउंड रिपोर्ट: यह निर्दलीय विधायक राजस्थान में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन सकता है!
आज से कोई 15 साल पहले की बात है. जोधपुर में जाट समाज की एक सभा हो रही थी. अटल बिहारी वाजपेयी उस समय प्रधानमंत्री हुआ करते थे. 1999 में उन्होंने राजस्थान के जाटों को केंद्र की OBC लिस्ट में जगह दी. 2003 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में वो अपने इसी काम को सियासी तौर पर भुनाना चाहते थे. उस समय राजस्थान बीजेपी के पास कोई बड़ा जाट चेहरा नहीं हुआ करता था. इस निर्वात को भरने के लिए दिल्ली के जाट नेता और वाजपेयी सरकार के मंत्री साहब सिंह वर्मा को राजस्थान के जाट बाहुल्य वाले इलाकों में प्रचार के लिए भेजा गया. जोधपुर की इस सभा को भी वही संबोधित करने जा रहे थे.
दोपहर के 12 बजने को थे. साहब सिंह वर्मा अभी मंच पर पहुंचे नहीं थे. उनके आने से पहले भीड़ को बांधे रखने के लिए मंच स्थानीय नेताओं के हवाले किया गया था. लोग जानते थे कि यह हर राजनीतिक जलसे में मुख्यवक्ता के बोलने से पहले की जरुरी प्रक्रिया है. वो पूरी ऊब के साथ इन वक्ताओं को सुने जा रहे थे. इस बीच मंच पर एक नौजवान को बुलाया गया. बेतरतीब तरीके से बढ़ी हुई दाढ़ी वाले इस नौजवान ने अपने भाषण की पहली कुछ लाइनों में ही जनता को बांध लिया. उसकी आवाज बुलंद थी. उसके पास शब्दों का टोटा नहीं था. वो बोलने के हुनर में तब से माहिर हो चुका था, जब वो राजस्थान विश्वविद्यालय का अध्यक्ष हुआ करता था. उसने बोलना शुरू किया-
“जाट बिरादरी, जो राजस्थान में सबसे ज्यादा बलवान, निडर और संख्या के लिहाज से सबसे मजबूत बिरादरी है. राजनीतिक दृष्टि से भी यह बिरादरी राजस्थान में सबसे आगे है. जाटों को मिला आरक्षण लोगों को सुहाया (पसंद नहीं आया) नहीं. सोशल जस्टिस फ्रंट के नाम से भाई कल्याण सिंह कालवी के लड़के लोकेंद्र सिंह कालवी ने 17 दिसंबर को सीकर के अन्दर एक रैली की. इस रैली में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का षड्यंत्र शामिल है.
पिछले लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में पहली बार गांव से आने वाली जाट महिलाएं सबसे ज्यादा संख्या में चुनकर आईं. अशोक गहलोत कभी नहीं चाहेंगे कि राजस्थान में जाट प्रशासनिक तौर पर मजबूत हों. अगर राजस्थान में जाट प्रशासनिक तौर पर मजबूत हो गया तो यह इनको कुछ भी निकालकर देने वाला नहीं है.”
इस नेता का नाम था हनुमान बेनीवाल. वो अपने भाषण में लोकेंद्र कालवी की जिस सीकर रैली का जिक्र कर रहे थे वो अपने एक बयान के चलते विवाद में फंस गई थी. इस विवाद को समझने के लिए सीकर 1998 में हुई रैली का जिक्र जरुरी है. 1998 में एक नाटकीय घटनाक्रम में इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री पद से रुखसत होना पड़ा. लोकसभा के लिए मध्यावधि चुनाव हुए. अटल बिहारी वाजपेयी उस दौर में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हुआ करते थे. बीजेपी ‘लक्ष्य अटल, वोट कमल’ के नारे पर चुनाव लड़ रही थी.
चुनाव प्रचार के लिए अटल बिहारी वाजपेयी राजस्थान के सीकर भी आए. राजस्थान में जाट आरक्षण आंदोलन अपने चरम पर था. सीकर में जाट बिरादरी के वोट बड़ी तादाद में थे. इस समय तक बीजेपी की छवि शहरी पार्टी के तौर पर ही थी. खेतिहर जाटों को अपने खेमे में लाने के लिए उन्होंने अपनी सीकर रैली में सरकार बनने के बाद जाटों को ओबीसी में आरक्षण देने की घोषणा कर दी.
देवी सिंह भाटी उस दौर में राजपूतों के कद्दावर नेता हुआ करते थे. वो बीकानेर के कोलायत से लगातार पांच विधानसभा चुनाव जीत चुके थे. इधर करणी सेना वाले लोकेंद्र सिंह कालवी भी राजपूत समाज में अपनी पकड़ बनाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे. दोनों उस समय बीजेपी के नेता हुआ करते थे. दोनों ने मिलकर अगड़ी जातियों के लिए आरक्षण आंदोलन चलाना शुरू किया. इन्होंने इसके लिए एक संगठन भी खड़ा किया, ‘सामाजिक न्याय मंच’. यह जाट आरक्षण आंदोलन का काउंटर नैरेटिव था.
लोकेंद्र कालवी और देवी सिंह भाटी सामाजिक न्याय मंच के बैनर तले जगह-जगह पर सभाएं कर रहे थे. अपनी सीकर रैली में लोकेंद्र कालवी ने आरक्षण की आलोचना करते हुए कहा था, ‘यहां घोड़ों को नहीं मिल रही है घास, और गधे खा रहे हैं चवनप्राश’ .आरक्षण के खिलाफ यह जुमला इससे पहले भी कई मंचों पर इस्तेमाल हो चुका था. राजस्थान में किवदंतियों के चलते इस जुमले ने विवाद को पैदा कर दिया. हर इलाके में जाति विशेष को चिढ़ाने के लिए कुछ शब्द गढ़े जाते हैं. पश्चिमी राजस्थान में जाटों को चिढ़ाने के लिए ‘गधा’ कहा जाता है. इस नुक्ते से देखने पर कालवी के बयान के मायने बदल जाते हैं.
सीकर वो जगह थी जहां जाटों ने अपने लिए आरक्षण लिया. सीकर वो जगह थीं जहां लोकेंद्र सिंह कालवी ने जाट विरोधी ध्रुवीकरण की कोशिश में विवादित बयाना दिया था. लोकेंद्र सिंह कालवी की रैली के 15 साल बाद सीकर में एक और रैली हुई. यह घटनाओं के चक्र के पूरे होने जैसा था. 10 जून 2018 को राजस्थान के सीकर में ‘ किसान हुंकार रैली’ का चौथा जुटान था. इससे पहले वो नागौर, बाड़मेर और बीकानेर में इसी नाम रैली कर चुके हैं. बाड़मेर में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से ज्यादा भीड़ जुटाकर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां हासिल की थीं. 2003 में अपने लिए सियासी जमीन की तलाश कर रहे हनुमान बेनीवाल डेढ़ दशक के भीतर एक मंझे हुए राजनेता के तौर पर उभर चुके हैं. उनके प्रभाव का दायरा एक विधानसभा सीट से बढ़कर पांच-छह जिलों तक फ़ैल चुका है.
2008 में एक फिल्म आई थी ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’. इस फिल्म का एक गाना, ‘जय हो’ बहुत हिट हुआ था. गुलजार के लिखे बोल और सुखविंदर सिंह की आवाज में रहमान का संगीत हमेशा मारक होता है. 2009 में कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में अपने प्रचार अभियान में इस गाने के इस्तेमाल के लिए टी-सीरीज को दो लाख डॉलर चुकाए थे. इस गाने के बोल इस तरह हैं –
“चख ले हां चख ले ये रात शहद है
चख ले रख ले
दिल है दिल आखिरी हद है
रख ले काला काला काजल तेरा
कोई काला जादू है ना..
आजा आजा जींद शामियाने के तले
आजा ज़री वाले नीले आसमान के तले
जय हो…”
किसान हुंकार रैली के पोस्टर पर जलसा शुरू होने का वक़्त 11 बजे दर्ज था. हनुमान बेनीवाल को मंच पहुंचते-पहुंचते 2 बज गए. जैसे ही मंच की तरफ बढ़ने लगे पंडाल में चारों तरफ बिखरे लोग मंच के सामने सिमट आए. जिन्हें जगह नहीं वो मिली वो दो पंडालों की सरहद के तौर पर लगाए गए लोहे के पाइपों पर चढ़ गए. बैकग्राउंड में यही गाना बज रहा था. जिसके बोलों से किसी को कोई मतलब नहीं था. लोग गाने के आखिरी हिज्जे को जोर से गा रहे थे. इस तरह जब हनुमान बेनीवाल मंच पर चढ़े, स्पीकर से लेकर भीड़ तक हर जगह ‘जय हो-जय हो’ की प्रतिध्वनि थी.
एक छात्रनेता इतना असरदार क्योंकर हुआ?
आखिर इस आदमी के इतना लोकप्रिय होने की वजह क्या है? क्यों हरियाणा से लेकर बाड़मेर तक लोग बेनीवाल की रैली अटेंड करने पहुंच जा रहे हैं. इसका जवाब हमें मिला रैली में आए हुए पप्पू बेनीवाल से. चुरू में रहने वाले पप्पू एक दफा जोधपुर जा रहे थे. जोधपुर के पास उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया. उन्होंने आधी रात को मदद के लिए हनुमान बेनीवाल के पास फोन किया. उनका कहना है कि हनुमान बेनीवाल आधे घंटे में खुद मौके पर पहुंच गए थे. उनकी खुद की विधानसभा में आपको ऐसी दर्जनों कहानियां मिल जाएंगी. इलाके के हर आदमी के पास उनके नंबर हैं. वो अपना फोन खुद उठाते हैं. अगर नहीं उठा पाते तो पलटकर फोन करते हैं. उन्होंने लोगों में यह भरोसा कायम किया है कि वो किसी भी वक़्त उन तक पहुंच सकते हैं.
राजस्थान का पश्चिमी इलाका जाट राजनीति का गढ़ रहा है. किसी दौर में राजस्थान के तीन बड़े सियासी जाट घराने इसी इलाके से आते थे. नाथूराम मिर्धा, परसराम मदेरणा मारवाड़ में और शीशराम ओला शेखावाटी में जाटों के सबसे बड़े नेता थे. संयोगवश ये तीनों ही परिवार अपनी राजनीतिक जमीन गंवा चुके हैं. हनुमान के उभार के पीछे इस निर्वात ने भी बड़ी भूमिका निभाई है.
*जेएमएम समीकरण*
हनुमान बेनीवाल मंच पर पांच लाख लोगों को जुटाने का दावा कर रहे थे. हालांकि यह दावा ही था. लेकिन सीकर में जहां उनका पहले कोई ख़ास आधार नहीं था, उन्होंने इतनी भीड़ जुटा ली थी कि वो कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं की पेशानी में बल ला पाएं. सीकर, झुंझनू, चुरू के अलावा बाड़मेर, नागौर, जोधपुर और बीकानेर से भी उनके समर्थक उनकी रैली में पहुंचे हुए थे. लगभग आधे घंटे के उनके भाषण में जो बात सबसे ज्यादा मार्के की थी वो कुछ इस तरह से बयान की गई-
*“बाड़मेर की रैली में जिस जेएमएम मोर्चे की घोषणा हमने की थी वो प्रदेश में आगे-आगे चलेगा.”*
जेएमएम मोर्चा आखिर है क्या? इस बात का जवाब देने से पहले चाय के कप पर हुई एक बतकही का जिक्र करना चाहिए. ये 2017 के जाड़े की बात है. हनुमान बेनीवाल नागौर में किसान हुंकार रैली का पहला संस्करण दाग चुके थे. जयपुर के जवाहर कला केंद्र में तीन पत्रकार इसी रैली पर बतकही कर रहे थे. इनमें से एक पत्रकार का कहना था कि अगर यह आदमी कायदे से चले तो राजस्थान का मुलायम सिंह यादव बन सकता है. सिर्फ जाटों के दम पर वो मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगे. सत्ता हासिल करने के लिए बेनीवाल को अल्पसंख्यक और दलित बिरादरी को अपने साथ लाना होगा.
बाड़मेर में घटनाओं ने प्रत्याशित मोड़ लिया. जनवरी 2018 में यहां हुई किसान हुंकार रैली में बेनीवाल जब मंच पर चढ़े तो उनकी जेब में नया जातिगत समीकरण पड़ा हुआ था. यह समीकरण था जेएमएमएम. माने जाट, मेघवाल, मुस्लिम और मीणा. मेघवाल पश्चिमी राजस्थान में दलितों की सबसे बड़ी बिरादरी है. इस मंच पर किरोड़ी लाल मीणा उनके साथ थे. मार्च 2018 में मीणा ने दस साल के लंबे वनवास के बाद बीजेपी का रुख किया. जाते-जाते वो अपने साथ इस समीकरण का आखरी ‘एम’ भी ले गए. सीकर में हनुमान बेनीवाल के पास सिर्फ जाट, मेघवाल और मुस्लिम का समीकरण बचा हुआ था. उनके मंच पर दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के कई नेता थे.
अपने भाषण में वो इस साल के 2 अप्रैल को हुए दलित आंदोलन का जिक्र कर रहे थे. उन्होंने बताया कि उस समय वो जैसलमेर में थे. उन्होंने उस समय प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दलितों का पूरा समर्थन किया था. वो कहते हैं-
*“दिल्ली की सरकार ने 23 दलितों को मौत के घाट उतार दिया. मरने के लिए इस देश में या तो गुर्जर है, या जाट है, या दलित है, या मुसलमान है. ये वो तमाम कौमें हैं जिनका आज तक शोषण हुआ.”*
इससे पहले वो अपने की भाषण की शुरुआत तेजा जी, बजरंगबली और रामसा पीर के जयकारे से करते हैं. तेजा जी राजस्थान के लोक देवता हैं. जाटों के बीच उनकी मान्यता बहुत ज्यादा है. इसी तरह से रामदेव जी महाराज भी राजस्थान के लोक देवता हैं. उन्हें मुस्लिम समुदाय के लोग रामसा पीर के नाम से पूजते हैं. पोकरण के पास रामदेवरा में उनका बड़ा मंदिर है. रामदेव जी मेघवाल समुदाय में भी बेहद लोकप्रिय हैं. यह जयकारा उनके चुनावी समीकरण का स्पष्टीकरण था.
*कितना सफल होगा समीकरण?*
पिछले दौर में दलित उत्पीड़न के दो मामलों में राजस्थान, राष्ट्रीय मीडिया की चर्चाओं में रहा. पहला मौक़ा था डांगावास में दलित समुदाय पर हुआ हमला. नागौर की मेड़ता तहसील के गांव डांगावास में एक मामूली जमीन विवाद ने मई 2015 में जातिगत हिंसा का रूप ले लिया था. इसमें 6 दलितों को जाट बिरादरी के लोगों ने मौत के घाट उतार दिया था. इस घटना के बाद दलित और जाट बिरादरी आमने-सामने हो गई थी. डांगावास आज भी पश्चिमी राजस्थान की मेघवाल बिरादरी की स्मृतियों में खैरलांजी की तरह दर्ज है.
दूसरा मौक़ा 2 अप्रैल के हालिया प्रदर्शन का है. राजस्थान में कई जगह दलित प्रदर्शनकारियों को हमलों का सामना करना पड़ा था. बाड़मेर, जोधपुर में ख़ास तौर दलित और जाट बिरादरी आमने-सामने हो गई थी. हनुमान बेनीवाल अपने भाषण में जैसलमेर की प्रेस कॉन्फ्रेंस का हवाला दे रहे थे. हो सकता है कि दलितों में उनकी लोकप्रियता ठीक-ठाक हो लेकिन उनकी बुनियादी पहचान जाट लीडर के तौर पर ही है. डांगावास जैसी घटनाओं के बाद दलितों का जाटों के प्रति अविश्वास बढ़ा है. ऐसे में दोनों जातियों को एक फोल्ड में लाना आसान नहीं होगा.
30 मई 2015 को नागौर से 20 किलोमीटर दूर बसे गांव कुम्हारी में अचानक सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया था. यह मुस्लिम बाहुल्य वाला गांव है. वाट्सएप्प के जरिए यहां अफवाह फैलाई गई कि 200 गायों को काटा गया है. जबकि यह जगह सरकार के द्वारा मरे हुए पशुओं के निस्तारण के लिए मुकर्र की गई थी. उस समय आस-पड़ोस के 10-15 गांवों के लोगों ने कुम्हारी को घेर लिया था. इन गांवों में जाटों की तादाद काफी ज्यादा है. हनुमान बेनीवाल ने यहां अपनी सूझबूझ से बड़ी सांप्रदायिक घटना को टाला था. इस घटना के बाद मुस्लिम बिरादरी में उनकी छवि काफी बेहतर हुई थी.
हनुमान बेनीवाल के साथ संकट यह है कि उनका सबसे बड़ा समर्थक जाट बिरादरी से आता है. वो इस बिरादरी के खिलाफ जाने का रिस्क नहीं ले सकते. दलितों और मुस्लिम समुदाय के लोगों को अपने साथ लेने के लिए उन्हें इन्हीं समुदायों के साफ छवि वाले नेता चाहिए होंगे. तो फिलहाल उनकी पूरी सियासी कवायद सिर्फ उनके इर्द-गिर्द है. ऐसे में दूसरे समुदाय के जो नेता उनके साथ जुड़े हुए हैं उनकी कोई मजबूत स्वतंत्र पहचान नहीं बन पा रही है. हो सकता है कि वो जयपुर की अपनी रैली में अपनी पूरी टीम जनता के सामने पेश करें. लेकिन यह विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले होगा. इतने कम समय में इनके लिए अपनी टीम के दलित और मुस्लिम चेहरों को जनता के बीच स्थापित करना टेढ़ी खीर होगी. उन्हें यह काम काफी पहले शुरू कर देना चाहिए था.
*इतिहास का सबक*
राजस्थान में 1977 तक एकछत्र कांग्रेस का शासन रहा. कांग्रेस के वर्चस्व को पहली मर्तबा चुनौती दी भैरों सिंह शेखावत ने. उस समय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था. 1977 के चुनाव में कांग्रेस को इंदिरा विरोधी लहर के चलते हार का मुंह देखना पड़ा था. भैरों सिंह शेखावत सूबे के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे. 1980 में इंदिरा ने सत्ता में लौटने के बाद भैरों सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया था. इसके बाद उन्हें 10 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा था. 1990 में वो मंदिर लहर में दूसरी मर्तबा मुख्यमंत्री बने. 1992 में बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने एक बार फिर से भैरों सिंह को गद्दी से उतारकर सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था.
1993 में सूबे में नए सिरे से चुनाव हुए. भैरों सिंह शेखावत इस चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर पत्थर को उलटकर देख रहे थे. ऐसे में काम आए उनके एक पड़ोसी. दरअसल जयपुर के सिविल लाइन्स में भैरों सिंह शेखावत के घर के ठीक सामने पूर्व मुख्यमंत्री बरकतुल्ला खान घर हुआ करता था. बरकत साहब के चले जाने के बाद यह घर उनके एकलौते दामाद ख़्वाजा हलीम की मिल्कियत में आ गया था. हमील उत्तर प्रदेश में समजवादी पार्टी के बड़े नेता थे. कभी-कभी जयपुर आने पर उनकी मुलाकात भैरों सिंह से भी हो जाया करती थी.
1993 में समाजवादी पार्टी को बने जुम्मा-जुम्मा चार रोज़ हुए थे. उत्तर प्रदेश में सीएम की कुर्सी पर बैठे मुलायम सिंह यादव अपनी नई पार्टी का आधार उत्तर प्रदेश से बाहर ले जाने को बेक़रार थे. हलीम ने उनके सामने राजस्थान चुनाव में उम्मीदवार उतारने की योजना रखी. मुलायम सिंह ने बिना किसी सवाल के इस योजना के लिए हामी भर दी. पुराने पत्रकार बताते हैं कि भैरों सिंह के इशारे पर ही समाजवादी पार्टी राजस्थान विधानसभा चुनाव में उतरी थी. भैरों सिंह शेखावत की योजना यह थी कि समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोटों में फाड़ डालने में कामयाब हो जाएगी. इसके लिए उन्होंने अपने भरोसेमंद सिपहसलार रघुबीर शेखावत को हलीम के साथ लगा दिया. हालांकि यह दांव बहुत सफल साबित नहीं हुआ. समाजवादी पार्टी को 18 में 17 सीटों पर जमानत जब्त करवानी पड़ी.
राजस्थान में तीसरा मोर्चा खड़ा करने का सबसे गंभीर प्रयास 2003 में हुआ. देवी सिंह भाटी और लोकेंद्र सिंह कालवी ने राजस्थान सामाजिक न्याय मंच के नाम से अपनी अलग पार्टी खड़ी की. इस पार्टी के पास अपना जातिगत समीकरण था. यह अगड़ी जातियों की गोलबंदी की कोशिश थी. इसमें गैर-जाट पिछड़ी जातियों को यह कहकर शामिल करने की कोशिश की गई थी कि जाटों को पिछड़ा वर्ग में आरक्षण मिलने के बाद शेष 200 से ज्यादा पिछड़ी जातियों का हक़ मारा जाना तय है. ऐसे में इस आरक्षण के खिलाफ एक होना जरूरी है. इस मोर्चे ने 65 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इसमें से 60 जगह जमानत जब्त हो गई थी. चार जगहों पर सामाजिक न्याय मंच के उम्मीदवार जमानत बचाने में कामयाब रहे थे. देवी सिंह भाटी इस मोर्चे के अकेले विधायक बने थे. हालांकि इस मोर्चे को बहुत कामयाबी नहीं मिली थी लेकिन इसने कई सीटों का गणित बिगाड़ दिया था.
2008 के चुनाव में किरोड़ी लाल मीणा ने बीजेपी से बगावत करके करीब 18 सीटों पर अपने निर्दलीय विधायक उतारे थे. उनके कुल 4 उम्मीदवार जीत कर आए थे. इसके आलवा उन्होंने पूर्वी राजस्थान की कई सीटों पर बीजेपी को बड़ा नुकसान पहुंचाया था. इस चुनाव में कांग्रेस को 200 में 96 सीट हासिल हुई थी. बीजेपी की हार के लिए किरोड़ी मीणा के भीतरघात को सबसे बड़ी वजह बताया गया था.
पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दौरान हनुमान बेनीवाल भी नागौर सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे. बीजेपी ने ज्योति मिर्धा के खिलाफ सीआर चौधरी को उतारा था. नागौर कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में से एक रही है. 1977 की इंदिरा विरोधी लहर के दौरान उत्तर भारत में इंदिरा गांधी का पत्ता साफ़ हो गया था. उस समय भी यह सीट कांग्रेस के खाते में गई थी. हनुमान बेनीवाल की मौजूदगी ने इस मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया था. वो डेढ़ लाख वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे. ज्योति मिर्धा 73,997 वोट से यह चुनाव हार गई थीं.
फिलहाल राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर उभर रही है. हनुमान बेनीवाल की मौजूदगी कई सीटों पर इस लहर में सेंधमारी करेगी. उनकी रैली में उमड़ती भीड़ को देखते हुए कहा जा सकता है कि वो कई जगहों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकने का माद्दा रखते हैं. यह कांग्रेस के लिए बुरी खबर है. कांग्रेस को उनकी मौजूदगी का सबसे ज्यदा घाटा उठाना पड़ेगा.
इससे भी बुरी खबर है युवाओं में बढ़ती उनकी लोकप्रियता. जाट परंपरागत तौर पर कांग्रेस के वोटर माने जाते हैं. हालांकि पिछले दस साल में जाटों का एक हिस्सा बीजेपी की तरफ मुड़ा है. लेकिन कांग्रेस का सबसे बड़ा जनाधार इसी बिरादरी में है. हनुमान बेनीवाल जिस तेजी से जाट युवाओं में अपनी पकड़ बना रहे हैं यह कांग्रेस के जनाधार को आने वाले सालों में बड़ा पलीता लगाएगा. सूबे में कांग्रेस के नेता अभी से अपनी जीत को निश्चित मानकर चल रहे हैं. इस अति-विश्वास में वो राजस्थान की जाट पट्टी के अंडरकरंट को सही तरीके से माप नहीं पा रहे हैं. आने वाले समय में उनको इसका घाटा भी उठाना पड़ सकता है.
जब हम रैली से निकल रहे थे तो बारिश के बाद सूरज निकल आया था. उमस अपने साथ पसीने की चिपचिपाहट लेकर आई थी. सड़क किनारे खड़ी बाइक पर दो युवा बैठे हुए थे. उनके बदरंग शर्ट उनके बदन से चिपके हुए थे. आगे वाला शख्स सेल्फी ले रहा था. पीछे वाल उत्तेजना में मुट्ठी बंद करके नारा लगा रहा था, ‘हनुमान बेनीवाल जिंदाबाद’, ‘किसान एकता जिंदाबाद’. ये दोनों युवा 50 किलोमीटर का सफ़र तय करके इस रैली में आए थे. किसानों की कर्जा माफ़ी हनुमान बेनीवाल का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है. अगर वो इस चुनाव को विकास की बजाए किसान की तरफ मोड़ पाते हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत होगी.
Sunday, June 17, 2018
Friday, June 15, 2018
हनुमान बेनीवाल पर नया गाना रिलीज ! जरूर सुनें !
दीजो दीजो बेनीवाल रो साथ ! हनुमान बेनीवाल एंव सनी जाट पर नया गाना जरूर सुनें एंव शेयर करें !
https://www.iaritoppers.com/
Wednesday, June 13, 2018
प्रदेश के जवानो, किसानो का हार्दिक आभार, शेखावाटी के नौजवानो का हार्दिक आभार #किसानहुंकारमहारैली सीकर को सफल बनाने के लिए |
जिस तरह प्रदेश भर से आपने वीर भूमि सीकर मे पधारकर व्यवस्था परिवर्तन के जन आंदोलन को मजबूत किया और एकता का परिचय दिया उससे निश्चित है की आने वाले दिनो मे जल्द ही हम सरकार को हमारी माँगो पर झुकाएँगे |
KHMSikar HB Mission2018
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KHMSikar HB Mission2018
Monday, June 11, 2018
Sunday, June 10, 2018
Live Tv हनुमान बेनीवाल सीकर रैली का सीधा प्रसारण !
हनुमान बेनीवाल का पूरा संबोधन लाइव देखने के लिए यहाँ क्लिक करें !

विधायक बेनीवाल का सीकर रैली में पूरा संबोधन - ( 86 मिनट ) :
सीकर रैली का सम्पूर्ण लाइव कवरेज ( 3 घंटे ) :-
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विधायक बेनीवाल का सीकर रैली में पूरा संबोधन - ( 86 मिनट ) :
Sikar रैली स्थल से लाइव ! हनुमान बेनीवाल लाइव टीवी
Sikar रैली स्थल से लाइव ! हनुमान बेनीवाल लाइव टीवी !
पार्ट - 1 ( पूरा संबोधन ) 3 घंटे का सम्पूर्ण विडियो
पार्ट - 2
पार्ट - 1 ( पूरा संबोधन ) 3 घंटे का सम्पूर्ण विडियो
पार्ट - 2
पार्ट - 3
मौसम खराब (बारिश ) होने के कारण लाइव प्रसारण करने में तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ इसलिए आपसे निवेदन है की आप लगातार हमारे साथ जुड़े रहे सीकर से पल पल की जानकारी आपके साथ साझा की जाएगी !
Live 11:32 A.M. ↴↴↴↴↴↴↴↴
Saturday, June 9, 2018
सीकर से हनुमान बेनीवाल एंव नारायण बेनीवाल का रैली के सम्बन्ध में सन्देश !
सीकर से हनुमान बेनीवाल एंव नारायण बेनीवाल का रैली के सम्बन्ध में सन्देश !
हनुमान बेनीवाल का संबोधन -
Friday, June 8, 2018
सीकर में बेनीवाल का ऐतिहासिक रोड शो ! विडियो देखे -
आज सीकर में विधायक हनुमान बेनीवाल का जबरदस्त रोड शो एंव जुलुस निकला जिसे देखकर प्रतीत होता है मानों शेखावाटी के आज तक के सारे रिकॉर्ड धराशायी हो जायेंगे ! पिछले काफी दिनों से विधायक बेनीवाल ने सीकर के नेताओं की नींद उड़ा रखी है ! विडियो देखे -
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सीकर किसान हुंकार महारैली का मैदान होगा हाई - टेक ! देखिये मैदान की सम्पूर्ण तैयारियां !
सीकर किसान हुंकार महारैली का मैदान होगा हाई - टेक !
नोट :- दिनांक 10 जून 2018 किसान हुंकार महारैली सीकर का लाइव प्रसारण आप इस ऐप पर देख सकेंगे अतः आपसे निवेदन है की सभी समर्थक अपने मित्रगणों को भी ऐप से जोड़ें !
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सीकर रैली में पधारने का आह्वान करते विधायक बेनीवाल !
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कल देर रात्रि Jodhpur जिले के ओसियां में आयोजित किसान हुंकार महारैली को लेकर जनसंपर्क सभा !
कल देर रात्रि #Jodhpur जिले के ओसियां के पण्डित जी की ढाणी, बैठवासियॉ गांव में आयोजित #किसानहुंकारमहारैली को लेकर जनसंपर्क सभा की तश्विरें आपके साथ साझा कर रहा हूं !
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Saturday, May 26, 2018
सीकर में किसानों के साथ ट्रेक्टर चलाते किसान नेता हनुमान बेनीवाल !
आज किसान नेता श्री हनुमान बेनीवाल ने अपने नाम के मुताबिक सीकर में किसानों के साथ ट्रेक्टर चलाकर किसान हितेषी होने का परिचय दिया ! सोशल मिडिया पर भी किसान नेता एंव विधायक श्री बेनीवाल की ट्रेक्टर चलाते हुए तस्वीरें एंव विडियो काफी वायरल हुए ! आपको बता दें की इन दिनों विधायक बेनीवाल सीकर में एक से बढ़कर एक तुफानी दौरे एंव किसान हुंकार महारैली की प्रबल तैयारियां कर रहे है जो की आने वाले विधानसभा चुनावों में उनकी मजबूती की ओर संकेत करता है !
विडियो नीचे देखें-
विडियो -
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विडियो नीचे देखें-
विडियो -
Friday, May 25, 2018
जिला मुख्यालय नागौर में किसान हुँकार महारैली सीकर को लेकर बेनीवाल के तत्वाधान में हुआ कार्यकर्ता सम्मेलन
नागौर. आज जिला मुख्यालय नागौर में
किसान हुँकार महारैली सीकर को लेकर खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल के तत्वाधान में कार्यकर्ता सम्मेलन का सफल आयोजन हुआ जिसमें विधायक बेनीवाल ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उनके मनोबल को बढ़ाया एंव सीकर रैली में अधिक से अधिक किसानों एंव युवाओं को जोड़ने के तरीकों से अवगत करवाया !
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किसान हुँकार महारैली सीकर को लेकर खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल के तत्वाधान में कार्यकर्ता सम्मेलन का सफल आयोजन हुआ जिसमें विधायक बेनीवाल ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उनके मनोबल को बढ़ाया एंव सीकर रैली में अधिक से अधिक किसानों एंव युवाओं को जोड़ने के तरीकों से अवगत करवाया !
Wednesday, May 23, 2018
आज सीकर के विभिन्न गांवों में जनसभा की कुछ तस्वीरें !
आज विधायक बेनीवाल सीकर के मैलासी, झीगर छोटी , गोठड़ा भूकरान, थोरासी इत्यादि गांवों के दौरे पर रहे जहाँ युवाओं , किसानों ने उनका जमकर स्वागत सत्कार किया एंव मैलासी गांव में किसानों ने विधायक बेनीवाल को हल भेंट कर परिवर्तन की राह पर चलने हेतु आशीर्वाद प्रदान किया !
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